The "Aigiri Nandini" hymn. Recited on Mahalaya Amavasya and through Navaratri.
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते।
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते॥
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥
Mahishasura Mardini Stotram (full — all 21 verses)
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम् (पूर्ण)
Form: Mahishasura Mardini
Adi Shankaracharya's ecstatic praise of Durga slaying Mahishasura. The most rhythmic stotra in all of Sanskrit literature, written in the relentless inflected metre that mimics drum-beats. Every verse ends with the refrain "jaya jaya he mahiṣāsura-mardini ramya-kapardini śaila-sute" — "Glory, glory, slayer of Mahishasura, beautifully-coiffed, daughter of the mountain." Chanted across Bengal during Durga Puja, especially on Mahalaya morning.
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दनुते ।
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ॥
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ १ ॥
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते ।
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते ॥
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥ २ ॥
अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्बवनप्रियवासिनि हासरते ।
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमालय शृङ्गनिजालय मध्यगते ॥
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिन…
One of three preliminaries to Chandi Path (Devi Mahatmya): Argala (the bolt), Kilaka (the nail), and Kavacha (the armour). Recited before Chandi Path to remove the obstacle-bolt that prevents the full benefit. Most verses end with the refrain "rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi" — "Give me beauty, give me victory, give me fame, destroy enemies."
ॐ नमश्चण्डिकायै ।
मार्कण्डेय उवाच ।
ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी ।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥
जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि ।
जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते ॥ २ ॥
मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ३ ॥
महिषासुरनिर्णाशिविधातृवरदे नमः ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ४ ॥
धूम्रनेत्रवधे देवि धर्मकामार्थदायिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ५ ॥
रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि ।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि ॥ ६ ॥
निशुम्भशुम्भनिर्णाशि त्रैलोक्यशुभदे नमः ।
रूपं देहि जयं …
The refrain verse from Devi Mahatmya recited on all nine nights of Navaratri. Each night invokes a different shakti.
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥